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कर चले हम फ़िदा (कैफ़ी आज़मी)

CBSE Class 10 Hindi (Course B) • Sparsh Part-2 • Poetry (Kavya Khand)

कवि: कैफ़ी आज़मी (Kaifi Azmi)

कैफ़ी आज़मी उर्दू और हिंदी के बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय شاعر (शायर/कवि) थे। उन्होंने फिल्मों के लिए बहुत सारे प्रसिद्ध गाने और ग़ज़लें लिखी हैं। उनकी कविताएँ हमेशा समाज की सच्चाई, इंसानियत और देश-प्रेम (Patriotism) के जज़्बे को सलाम करती हैं। 'कर चले हम फ़िदा' भारत-चीन युद्ध (1962/Sino-Indian War) की पृष्ठभूमि पर बनी फ़िल्म 'हकीक़त' (Haqeeqat) का एक बहुत ही भावुक और मशहूर देशभक्ति गीत है। इस गीत में मातृभूमि (Motherland) के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले सैनिकों (Soldiers) की 'अंतिम इच्छा और संदेश' को बड़े मार्मिक ढंग से पेश किया गया है।

कविता का मूल भाव (Theme/Core Message):

इस गीत में बर्फीली चोटियों (Himalayas) पर लड़ते हुए एक भारतीय वीर 'सैनिक' की 'शहादत' (Martyrdom) और उसके मन के भावों का वर्णन है। युद्ध के मैदान में अपने प्राण त्यागते हुए शहीद सैनिक, पीछे छूटने वाले अपने देशवासियों (नौजवानों) को एक भारी संदेश देता है। वह कहता है कि: "हम तो अब अपना शरीर और अपनी जान इस देश को आज़ाद और सुरक्षित रखने के लिए दे रहे हैं। अब हमारे जाने के बाद यह देश (मातृभूमि) तुम्हारे हवाले है। तुम्हें इसकी रक्षा करनी है और दुश्मनों को इस पवित्र धरती पर कदम नहीं रखने देना है।" यह कविता शहादत के गर्व और देशवासियों के प्रति सैनिकों की अपार उम्मीद (Hope) को जगाती है।

पद 1: अंतिम सांस तक लड़ना (सैनिक का बलिदान)

कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों!
साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई,
फिर भी बढ़ते क़दम को न रुकने दिया,
कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं,
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया!
मरते-मरते रहा बाँकपन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों!

शब्दार्थ: फ़िदा (نثار) = न्यौछावर/क़ुर्बान (Sacrifice), जान-ओ-तन = प्राण और शरीर (Life and Body), हवाले = सौंपना/जिम्मेदारी (Handover), नब्ज़ = हृदय की धड़कन/नाड़ी (Pulse), ग़म (غم) = दुख/शोक (Sorrow), बाँकपन = शूरवीरता और जवानी का जोश (Courage/Youthfulness)।

भावार्थ: 1962 के युद्ध में, हिमालय की बर्फीली चोटियों पर देश के लिए लड़ता हुआ एक घायल सैनिक 'शहीद' होने वाला है। वह अपने देशवासियों और बाकी सैनिकों से कहता है कि:
"हे मेरे साथियों! मैं अब अपने शरीर और अपनी जान को इस देश पर न्यौछावर (फ़िदा) करके जा रहा हूँ। मेरे जाने के बाद, अब मैं इस मातृभूमि (वतन) की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी तुम्हारे हाथों में (तुम्हारे हवाले) सौंप रहा हूँ।"
सैनिक बताता है कि, "हिमालय पर बहुत अधिक 'बर्फ़' (कड़ाके की ठंड) थी, जिसके कारण हमारी साँसें और हमारी नब्ज़ (Pulse) जम गई थी (ख़ून भी जम रहा था)। फिर भी हमने हार नहीं मानी और दुश्मनों की ओर बढ़ते हुए अपने क़दमों को रुकने नहीं दिया।
हमारे 'सिर (सर)' कट गए (अर्थात हम शहीद हो गए) तो हमें 'कोई ग़म (दुख)' नहीं है, लेकिन हमें इस बात का बहुत 'गर्व' है कि जो 'हिमालय' (भारत के स्वाभिमान का प्रतीक) है, हमने दुश्मनों के आगे उसका 'सिर नहीं झुकने दिया' और उसे आज़ाद रखा। मरते दम तक हमारे अंदर बहादुरी और जवानी का जोश (बाँकपन) भरा रहा।"

पद 2: बलिदान का मौसम (शहादत की ख़ुशी)

ज़िन्दा रहने के मौसम बहुत हैं मगर,
जान देने की रुत रोज़ आती नहीं;
हुस्न और इश्क़ दोनों को रुसवा करे,
वो जवानी जो खूँ में नहाती नहीं!
आज धरती बनी है दुलहन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों!

शब्दार्थ: रुत = मौसम (Season), रुसवा (رسوا) = बदनाम/अपमानित (Defame), हुस्न (حسن) = सुंदरता/जवानी (Beauty), इश्क़ (عشق) = प्यार/देश-प्रेम (Love), खूँ (خون) = ख़ून/रक्त (Blood)।

भावार्थ: शहीद सैनिक देश के जवानों को देश-प्रेम की प्रेरणा देते हुए कहता है कि:
"इस दुनिया में इंसान को 'जिंदा रहने के' और खुशी मनाने के बहुत से मौके (मौसम) मिलते हैं, लेकिन 'देश के लिए अपनी जान क़ुर्बान करने का (बलिदान का) मौसम' या 'रुत' रोज़-रोज़ नहीं आती है। यह एक बहुत बड़ा सौभाग्य (Luck) है।
जो जवानी देश की रक्षा के लिए युद्ध के मैदान में अपना 'ख़ून (खूँ) नहीं बहाती' (अर्थात जिसे मातृभूमि से प्यार नहीं है), वह जवानी अपनी 'सुंदरता' (हुस्न) और 'प्रेम' (इश्क़) दोनों को बदनाम (रुसवा) कर देती है, क्योंकि देश-प्रेम ही सबसे बड़ा प्रेम है।
सैनिक आगे कहता है कि: "देखो! आज यह धरती (मातृभूमि) (सैनिकों के ख़ून से लाल होकर) 'एक नई-नवेली दुलहन' (Bride) की तरह सज गई है। तुम्हें इस दुलहन (धरती) की इज़्ज़त की रक्षा करनी है। जाते-जाते अब मैं यह वतन तुम्हारे हाथों में छोड़कर जा रहा हूँ।"

पद 3: शहादत से नए काफ़िले बनाना

राह क़ुर्बानियों की न वीरान हो,
तुम सजाते ही रहना नए क़ाफ़िले;
फ़तह का जश्न इस जश्न के बाद है,
ज़िंदगी मौत से मिल रही है गले!
बाँध लो अपने सर से कफ़न साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों!

शब्दार्थ: क़ुर्बानियों (قربانیوں) = बलिदानों (Sacrifices), वीरान = सूना/खाली (Desolate), क़ाफ़िले (قافلے) = यात्रियों/सैनिकों का समूह (Caravans), फ़तह (فتح) = जीत (Victory), जश्न (جشن) = खुशी/उत्सव (Celebration), कफ़न = मौत का कपड़ा।

भावार्थ: मौत के गले लग रहा सैनिक देशवासियों से कहता है कि:
"हमने देश के लिए जो बलिदान (क़ुर्बानियों) का रास्ता (राह) चुना है, मेरा मरने के बाद यह रास्ता कभी 'खाली' या सूना (वीरान) नहीं पड़ना चाहिए। मेरे बाद भी तुम 'देशभक्त सैनिकों के नए-नए जत्थे/समूह' (क़ाफ़िले) सजाकर आगे भेजते रहना।
इस 'शहादत (बलिदान) के जश्न' के बाद ही तुम्हें युद्ध में 'जीतने का असली जश्न' (फ़तह का जश्न) मनाने का मौक़ा मिलेगा।
आज आज़ादी को बचाने के लिए ज़िंदगी और मौत आपस में ख़ुशी-ख़ुशी गले मिल रही हैं (अर्थात, हम मौत को ख़ुशी से अपना रहे हैं)।
इसलिए हे नौजवानों! अब तुम भी मौत से न डरते हुए 'अपने सिर पर कफ़न बाँधकर' तैयार हो जाओ और युद्ध-भूमि में उतर पड़ो। अब इस वतन की ज़िम्मेदारी बस तुम्हारे कंधों पर है।"

पद 4: मातृभूमि की रक्षा का संकल्प (राम-लक्ष्मण का प्रतीक)

खींच दो अपने खूँ से ज़मीं पर लकीर,
इस तरफ़ आने पाए न रावन कोई;
तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे,
छू न पाए सीता का दामन कोई!
राम भी तुम तुम्हीं लछमन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों!

शब्दार्थ: लकीर = रेखा (Line / Laxman Rekha), रावन = दुश्मन (रावण का प्रतीक), सीता = मातृभूमि (धरती माता), दामन = आंचल/पल्लू (Honor), लछमन = लक्ष्मण।

भावार्थ: अंतिम पद में सैनिक बहुत ही जोश के साथ देशवासियों से और सीमा (Border) पर खड़े जवानों से कहता है कि:
"हे मेरे साथियों! तुम्हें अपने देश की सरहदों (Borders) पर अपने 'ख़ून से लक्ष्मण रेखा' (लकीर) खींच देनी चाहिए; ताकि अगर कोई भी 'रावण रूपी दुश्मन' (जैसे चीन की सेना) हमारे देश की सीमा के अंदर आने की कोशिश करे, तो वह अंदर ना आ सके।
अगर कोई भी दुश्मन तुम्हारी 'सीता रूपी पवित्र मातृभूमि' (धरती माता) के 'दामन' (इज़्ज़त) को छूने के लिए अपनी गंदी नज़रें उठाए या अपना हाथ आगे बढ़ाए, तो 'उसके हाथ तुरंत तोड़ दो'। भारत माता के दामन को छूने का किसी को हक़ नहीं है।
अंत में सैनिक कहता है कि, है नौजवानों! अब तुम ही मेरे बाद इस धरती की रक्षा करने वाले 'राम' हो और तुम ही 'लक्ष्मण' हो (अर्थात अब देश को तुम्हें ही बचाना है)। मैं तो अपना शरीर त्यागकर जा रहा हूँ, अब यह आज़ाद वतन तुम्हारे हवाले है!"

शिल्प-सौंदर्य और मुख्य बातें: कविता में वीर रस (Veer Ras) और करुण रस (Karun Ras) का बहुत सुंदर संगम है। भाषा में सरल हिंदी और 'उर्दू-फ़ारसी' के शब्दों (जैसे- फ़िदा, नब्ज़, ग़म, रुत, हुस्न, इश्क़, खूँ, क़ाफ़िले, फ़तह) का प्रयोग हुआ है, जो इसके भाव को और गहरा बनाते हैं। धरती को 'सीता' और दुश्मन को 'रावण' का प्रतीक मानकर बहुत बढ़िया उदाहरण दिया गया है।

BOARD EXAM QUESTIONS

प्रश्न 1: सैनिक ने 'हिमालय का सिर न झुकने देने' का क्या अर्थ बताया है? युद्ध के मैदान में सैनिकों ने कैसा धैर्य और बलिदान दिखाया?

उत्तर: 'हिमालय' भारत के स्वाभिमान, मान-सम्मान और आज़ादी का सबसे बड़ा 'प्रतीक' है।
सैनिक बताते हैं कि चीन से युद्ध करते हुए 1962 में बर्फीली पहाड़ियों (हिमालय) पर कड़ाके की ठंड थी। उस भयानक ठंड के कारण साँस रुकने लगी थी और 'नब्ज़' (Pulse और खून) तक जमने लगी थी, फिर भी सैनिकों ने हार नहीं मानी।
उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं हटाए। भले ही उनके 'सिर कट गए' (शहीद हो गए), लेकिन उन्होंने दुश्मन को हिमालय पर कब्जा नहीं करने दिया, अर्थात् उन्होंने भारत माता (हिमालय) का सिर गर्व से ऊँचा रखा और उसे दुश्मनों के आगे 'झुकने नहीं दिया'


प्रश्न 2: "ज़िन्दा रहने के मौसम बहुत हैं मगर, जान देने की रुत रोज़ आती नहीं।" - इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: शहीद सैनिक अपने देश के नौजवानों को संबोधित करते हुए कहता है कि:
एक आम इंसान को अपनी 'जिंदगी में खुशियां मनाने' (जिंदा रहने) के तो अनगिनत मौके और मौसम मिलते हैं। लेकिन अपने देश (मातृभूमि) की रक्षा करते हुए, 'शहीद होने' या 'बलिदान देने का मौसम' (जान देने की रुत) जीवन में बार-बार और रोज़ नहीं मिलता है। यह मौसम बड़े सौभाग्य से मिलता है।
अतः यदि तुम्हारे सामने देश की रक्षा के लिए अपनी जान देने का मौका आए, तो घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि देश-प्रेम (इश्क़) से बढ़कर जवानी की कोई सुंदरता (हुस्न) नहीं होती।


प्रश्न 3: "आज धरती बनी है दुलहन साथियों" - कवि (कैफ़ी आज़मी) ने ऐसा क्यों कहा है?

उत्तर: कवि ने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि युद्ध-भूमि (बॉर्डर) पर लगातार भारतीय सैनिकों का ख़ून बह रहा है।
उन वीर 'शहीद सैनिकों के ख़ून' से भारत की यह 'धरती लाल हो गई है' और वह ख़ून से सनी हुई धरती बिल्कुल एक 'नई-नवेली लाल जोड़े में सजी दुलहन' के समान लग रही है। जिस प्रकार एक पति अपनी 'दुलहन' की इज़्ज़त और आबरू (Honor) की रक्षा करता है, उसी प्रकार देश के नौजवानों को भी अपनी इस 'मातृभूमि' (दुलहन) की रक्षा दुश्मनों से करनी है; उसे किसी भी कीमत पर अपवित्र नहीं होने देना है।


प्रश्न 4: राम, लक्ष्मण, रावण और सीता के प्रतीक के माध्यम से सैनिक अपने देशवासियों को क्या अंतिम संदेश देता है?

उत्तर: कविता के अंतिम पद में शहीद सैनिक नौजवानों को समझाता है:
- सीता: हमारी पवित्र और महान 'भारत माता' (मातृभूमि) है।
- रावण: देश की सीमा पर खड़ा हमारा क्रूर 'दुश्मन' है (जैसे 1962 में चीन)।
- राम और लक्ष्मण: देश की रक्षा करने वाले सभी 'नौजवान' और 'भारतीय सैनिक' हैं।
सैनिक अंतिम संदेश देता है कि, "हे देशवासियो! तुम्हें अपने 'ख़ून से ज़मीन पर एक लक्ष्मण-रेखा' खींच देनी चाहिए, ताकि कोई भी रावण (दुश्मन) अंदर न आ सके। यदि वह हमारी सीता (धरती) की इज़्ज़त (दामन) को छूने की कोशिश करे, तो उसके हाथ तोड़ दो। मैं तो अपना शरीर छोड़कर जा रहा हूँ, अब इस देश को बचाने वाले राम और लक्ष्मण सिर्फ तुम लोग ही हो।"